न्यूज डेस्क।NEET-UG री-एग्जाम से पहले टेलीग्राम पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार को अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि कुछ परीक्षार्थियों की वजह से 15 करोड़ टेलीग्राम यूजर्स के अधिकारों पर रोक कैसे लगाई जा सकती है। जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि किसी एक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करना गंभीर कदम है और इसकी संवैधानिक वैधता की जांच जरूरी है।
आनुपातिकता की कसौटी पर बहस
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि इंटरनेट बंद करने जैसे कदम आमतौर पर कानून व्यवस्था की असाधारण परिस्थितियों में उठाए जाते हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या NEET री-एग्जाम के लिए पूरे प्लेटफॉर्म पर रोक लगाना आनुपातिक कदम माना जा सकता है। बेंच ने कहा कि एक समूह की सुरक्षा के लिए दूसरे करोड़ों लोगों के अधिकार सीमित करना आसान फैसला नहीं हो सकता।
सरकार ने बताया एडिट फीचर का खतरा
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि टेलीग्राम का मैसेज एडिट फीचर सबसे बड़ी चिंता है। उन्होंने दावा किया कि कोई व्यक्ति परीक्षा के बाद प्रश्नपत्र अपलोड करके उसे पुरानी तारीख का दिखा सकता है। सरकार का कहना है कि इसी वजह से फर्जी पेपर लीक के दावे तेजी से फैलते हैं और छात्रों में भ्रम पैदा होता है।
फर्जी पेपर लीक और ठगी का तर्क
सरकार ने अदालत को बताया कि टेलीग्राम पर कई चैनल छात्रों से हजारों और लाखों रुपये लेकर प्रश्नपत्र देने का दावा कर रहे थे। NTA का कहना है कि ये प्रश्नपत्र असली नहीं हैं, लेकिन बड़ी संख्या में छात्र इनके झांसे में आ जाते हैं। सरकार के मुताबिक परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखने और अफवाहों को रोकने के लिए अस्थायी प्रतिबंध जरूरी था।
टेलीग्राम ने फैसले का विरोध किया
टेलीग्राम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने कहा कि सरकार तकनीकी तथ्यों को गलत तरीके से पेश कर रही है। उन्होंने बताया कि किसी संदेश का टाइमस्टैम्प एडिट नहीं किया जा सकता और कंपनी संदिग्ध कंटेंट हटाने के लिए लगातार कार्रवाई करती है। टेलीग्राम ने तर्क दिया कि कुछ गलत तत्वों की वजह से पूरे प्लेटफॉर्म को बंद करना उचित नहीं है।
आतंकी गतिविधियों का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने एक सरकारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि टेलीग्राम कई बार आतंकवादी गतिविधियों और अवैध नेटवर्क के लिए भी इस्तेमाल होता रहा है। सरकार का दावा है कि प्लेटफॉर्म की क्लाउड आधारित संरचना और बॉट सिस्टम कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए चुनौती पैदा करते हैं। हालांकि अदालत ने संकेत दिया कि अंतिम फैसला संवैधानिक और कानूनी मानकों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।
