नेशनल डेस्क. नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET-UG पेपर लीक और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन अब अपने मूल उद्देश्य से भटकता हुआ दिखाई दे रहा है। प्रदर्शन स्थल पर अब शिक्षा सुधार और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता की चर्चा से अधिक धार्मिक नारेबाजी, अलग-अलग संगठनों की मौजूदगी, छोटे-छोटे समूहों की गतिविधियां और असंगठित भीड़ चर्चा का विषय बन गई हैं। घटनाक्रम को देखने वाले कई लोगों का मानना है कि आंदोलन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और इसकी मूल मांगें भीड़ और अलग-अलग हितों के बीच कहीं दबती नजर आ रही हैं। इससे आंदोलन के नेतृत्व और दिशा दोनों पर सवाल उठने लगे हैं।
धार्मिक नारे और हथियारों के प्रदर्शन ने बढ़ाई चिंता
बुधवार रात जंतर-मंतर पर ऐसे दृश्य देखने को मिले, जिन्होंने आंदोलन की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लाउडस्पीकर से धार्मिक नारे लगाए गए, जिनका जवाब भी दूसरे धार्मिक नारों से दिया गया। कुछ समय तक यह नारेबाजी लगातार चलती रही और भीड़ का एक हिस्सा इसमें शामिल होता रहा, जबकि कई लोग पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाते रहे। इसी दौरान टॉलस्टॉय मार्ग के पास निहंग समुदाय के कुछ सदस्य तलवारें, कृपाण और भाले जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ दिखाई दिए। उन्होंने कई बार अपने हथियार हवा में लहराए और तस्वीरें भी खिंचवाईं। मौके पर मौजूद दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवान पूरी स्थिति पर नजर बनाए रहे, जबकि भीड़ के कुछ लोगों ने इस प्रदर्शन का स्वागत भी किया।
20 जुलाई के बाद तेजी से बदला आंदोलन का स्वरूप
प्रदर्शन स्थल की स्थिति में सबसे बड़ा बदलाव 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई के बाद देखने को मिला। इसके बाद बड़ी संख्या में नए लोग जंतर-मंतर पहुंचने लगे, जिनमें कई ऐसे भी थे जो पहले इस आंदोलन का हिस्सा नहीं थे। भीड़ बढ़ने के साथ आंदोलन का दायरा भी व्यापक हुआ, लेकिन उसके साथ नियंत्रण बनाए रखना कठिन होता गया। अब प्रदर्शन स्थल पर कई छोटे-छोटे समूह अपने-अपने मुद्दों और नारों के साथ सक्रिय दिखाई देते हैं। कुछ शिक्षा सुधार की बात करते हैं, जबकि कुछ पूरी तरह अलग राजनीतिक या सामाजिक मुद्दे उठाते नजर आते हैं। इससे आंदोलन की केंद्रीय मांगें पीछे छूटती दिखाई दे रही हैं।
सोनम वांगचुक की गैरमौजूदगी के बाद बदली तस्वीर
आंदोलन के शुरुआती दिनों में शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इसकी सबसे प्रमुख पहचान बनकर उभरे थे। उनके अनिश्चितकालीन अनशन ने देशभर के छात्रों और युवाओं का ध्यान इस आंदोलन की ओर खींचा। विभिन्न राज्यों से छात्र जंतर-मंतर पहुंचे, स्वयंसेवकों ने व्यवस्था संभाली और डॉक्टर लगातार वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी करते रहे। उनकी मौजूदगी के कारण आंदोलन शिक्षा, परीक्षा सुधार और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा। हालांकि 18 जुलाई को उन्हें जंतर-मंतर से हटाकर अस्पताल ले जाने के बाद आंदोलन में वह एकजुटता दिखाई नहीं दे रही है, जो पहले नजर आती थी।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने भी बढ़ी चुनौती
प्रदर्शन स्थल पर लगातार बढ़ती भीड़ और अलग-अलग समूहों की सक्रियता ने सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी भी बढ़ा दी है। हाल के दिनों में एक यूट्यूबर के साथ मारपीट, प्रदर्शनकारियों और निहंग समूह के बीच विवाद तथा पुलिस और RAF कर्मियों के साथ लगातार नोकझोंक जैसी घटनाएं सामने आई हैं। 20 जुलाई की कार्रवाई को लेकर आलोचना झेलने के बाद सुरक्षा बल अब काफी संयम के साथ स्थिति को संभालते नजर आ रहे हैं। इसके बावजूद अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण बना रहे और कोई भी छोटी घटना बड़े तनाव का कारण न बन जाए।
आंदोलन की दिशा पर उठ रहे गंभीर सवाल
सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ ने भी सोशल मीडिया पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि संवाद में खालीपन पैदा होता है तो किसी भी शांतिपूर्ण और मुद्दा आधारित आंदोलन को बाहरी तत्व अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। उनका मानना है कि दिल्ली से शुरू हुआ यह आंदोलन अब देश के दूसरे हिस्सों तक फैल रहा है और ऐसे में इसकी दिशा बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है। फिलहाल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है, लेकिन बदलते घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आंदोलन अपने मूल उद्देश्य पर केंद्रित रह पाएगा या विभिन्न समूहों और अलग-अलग एजेंडों के कारण उसकी पहचान पूरी तरह बदल जाएगी।
