कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में सोमवार को बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया। तृणमूल कांग्रेस के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र सौंप दिया। सांसदों ने भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की है। इस कदम के बाद टीएमसी की संसदीय इकाई में औपचारिक टूट की स्थिति बन गई है। सांसदों के इस फैसले को पार्टी के गठन के बाद सबसे बड़े राजनीतिक संकटों में से एक माना जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी की एकजुटता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
महुआ मोइत्रा का यूसुफ पठान पर सीधा हमला
संकट के बीच कृष्णानगर से सांसद महुआ मोइत्रा खुलकर ममता बनर्जी के समर्थन में उतर आई हैं। उन्होंने बहारामपुर सांसद और पूर्व क्रिकेटर यूसुफ पठान पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पणी की। महुआ ने लिखा कि जिले की जनता ने उन्हें भारी मतों से जिताया था, इसलिए उन्हें “थोड़ी शर्म और थोड़ी हिम्मत” दिखानी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यूसुफ पठान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बुलावे पर तुरंत दिल्ली पहुंच गए। महुआ की टिप्पणी को पार्टी के भीतर बढ़ती खींचतान और गुटबाजी का खुला संकेत माना जा रहा है।
यूसुफ पठान पहले भी विवादों के केंद्र में रहे
यूसुफ पठान हाल के दिनों में तब भी चर्चा में आए थे जब एक बंगाली अखबार ने दावा किया था कि टीएमसी ने पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली की मदद से उन्हें बहारामपुर सीट छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि ममता बनर्जी उस सीट से उपचुनाव लड़ना चाहती थीं। हालांकि यूसुफ पठान ने कथित तौर पर यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। बाद में सौरव गांगुली ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह गलत बताया। गौरतलब है कि 2024 लोकसभा चुनाव में यूसुफ पठान ने कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी को हराकर बहारामपुर सीट टीएमसी की झोली में डाली थी।
काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में सांसदों का नया गुट
सूत्रों के मुताबिक टीएमसी के बागी सांसदों का नेतृत्व पार्टी की मुख्य सचेतक काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं। उन्होंने कहा कि सांसदों ने जनता के जनादेश को स्वीकार करते हुए अपने राजनीतिक भविष्य को एनडीए के साथ जोड़ने का फैसला किया है। हालांकि बागी सांसदों ने फिलहाल टीएमसी छोड़ने या भाजपा में शामिल होने की कोई घोषणा नहीं की है। उनका कहना है कि वे अलग संसदीय समूह के तौर पर काम करेंगे, लेकिन एनडीए को समर्थन देंगे। राजनीतिक जानकार इसे दल-बदल कानून से बचने की रणनीति के तौर पर भी देख रहे हैं।
सांसदों से पहले विधायक दल में भी पड़ चुकी है फूट
लोकसभा सांसदों की बगावत से कुछ दिन पहले ही टीएमसी विधायक दल में भी बड़ा विभाजन देखने को मिला था। निष्कासित नेताओं ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने दावा किया था कि उन्हें 60 विधायकों का समर्थन हासिल है। दोनों नेताओं ने एक पत्र के जरिए ममता बनर्जी को पार्टी नेता मानते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाने का प्रस्ताव रखा था। इस घटनाक्रम को अभिषेक बनर्जी को अलग-थलग करने की कोशिश माना गया। 60 विधायकों के समर्थन के साथ यह गुट दल-बदल कानून के तहत जरूरी दो-तिहाई संख्या के करीब पहुंच गया।
ममता और अभिषेक के सामने सबसे बड़ी चुनौती
टीएमसी के भीतर एक साथ सांसद और विधायक स्तर पर उभरी बगावत ने पार्टी नेतृत्व के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक तरफ महुआ मोइत्रा जैसे नेता खुलकर ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। यदि बागी सांसद और विधायक अपने रुख पर कायम रहते हैं तो आने वाले दिनों में पार्टी की संगठनात्मक और संसदीय ताकत दोनों प्रभावित हो सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट सिर्फ नेतृत्व की लड़ाई नहीं, बल्कि टीएमसी के भविष्य की दिशा तय करने वाली लड़ाई बन सकता है।
